(याद कीजिए उन दोपहरियों को जब विविध भारती पर विभिन्न भाषाओं के लोकगीत बजते थे। शाम के समय दक्षिण भारतीय भाषाओं के गीत आते थे। विभिन्न स्रोतों से सुनाई पड़नेवाले कुछ गीतों के बोल और धुन इतने अच्छे लगते कि वे कब हमारे साँसों की लय बन जाते, पता भी नहीं चलता था। अन्य भाषाओं के गानों के अर्थ अकसर मालूम भी नहीं होते थे। अलग-अलग कारणों से कई गीतों ने दिल और दिमाग में घर बना लिया है। बरसों पहले अपने एक मित्र के अनुरोध पर बंगला के एक गीत की ऐसी ही एक धुन पर यह गीत लिखा था।)
तू जैसे आज भी मेरे आसपास है
तू जैसे आज भी
मेरे आसपास है
ढल गया दिन मगर
बाकी उजास है
तू जैसे आज भी मेरे आसपास है
मेरे आसपास है
ढल गया दिन मगर
बाकी उजास है
तू जैसे आज भी मेरे आसपास है
तेरे बिना कुछ ऐसे बीता ये जीवन
सुख मैंने छुआ नहीं
दुख ने तो छुआ नहीं मन
तन जैसे महल मेरा
मन वनवास है
तू जैसे आज भी मेरे आसपास है
सुख मैंने छुआ नहीं
दुख ने तो छुआ नहीं मन
तन जैसे महल मेरा
मन वनवास है
तू जैसे आज भी मेरे आसपास है
जहाँ था कभी उजाला
आज अंधकार
आँखों में आँसू बनकर
लौटे तुम बार बार
आज अंधकार
आँखों में आँसू बनकर
लौटे तुम बार बार
रहा नहीं
दुनिया से कभी कोई काम
जब भी कोई तारा टूटा
होंठों पर आया तेरा नाम
मन जैसे पंछी मेरा
तू आकाश है
तू जैसे आज भी मेरे आसपास है
ढल गया दिन मगर बाकी उजास है
दुनिया से कभी कोई काम
जब भी कोई तारा टूटा
होंठों पर आया तेरा नाम
मन जैसे पंछी मेरा
तू आकाश है
तू जैसे आज भी मेरे आसपास है
ढल गया दिन मगर बाकी उजास है
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- प्रमोद शर्मा
- प्रमोद शर्मा

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